
शिशु की रीढ़ की हड्डी को, उसके जन्म से पहले या जन्म प्रक्रिया के दौरान पहुंचे किसी भी आघात को रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष माना जाता है। हम सभी जानते हैं कि नवजात शिशुओं में रीढ़ की हड्डी किसी भी प्रकार के यांत्रिक प्रभाव को लेकर बहुत संवेदनशील होती है। इस लेख में हम नवजात शिशु की रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष के लक्षण, कारण, निदान, और दीर्घकालिक प्रभावों पर चर्चा करेंगे।
रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष के लक्षण
प्रायः नवजात शिशुओं में रीढ़ की हड्डी को आघात तब पहुँचता है जब जन्म के समय प्रसूति शक्तियों का उपयोग या सीज़ेरियन डिलीवरी की जाती है।
इसके अलावा, बच्चे का वजन भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। तीन किलोग्राम से कम या 4 किलो से ज्यादा वजन वाले बच्चों को जन्म के समय रीढ़ की हड्डी में आघात का खतरा ज्यादा रहता है।
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कई मामलों में क्षतिग्रस्त रीढ़ की हड्डी के लक्षण नजर नहीं आते और काफी समय तक उजागर भी नहीं होते। ऐसे में, नीचे दिए लक्षणों को ध्यान में रखकर, आप इस समस्या के उपस्थित होने की पुष्टि कर सकते हैं।
- मस्तिष्क की प्रभावित कार्यक्षमता
- बढ़ा हुआ इंट्राक्रैनियल दबाव
- नर्वस सिस्टम के साथ समस्याएं
- मोटर विकास और भाषण विकास में देरी
- बहुत ज्यादा उत्तेजना और अति सक्रियता
- हाड़ पिंजर प्रणाली अर्थात Musculoskeletal से जुड़े विकार
- एलर्जी प्रतिक्रियाएं
- माइग्रेन, बेहोशी, सामान्य थकान और दस्त जैसे विकार
- साँस लेने में तकलीफ
ध्यान दें कि प्रत्येक मामले में लक्षण अलग-अलग हो सकते हैं। डॉक्टर को अधिक विस्तृत जानकारी प्रदान करने के लिए, बच्चे में उपस्थित ऐसे किसी भी लक्षण की बारीकी से निगरानी करना आवश्यक है।
रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष के कारण
डिलीवरी का समय काफी कठिन होता है। ऐसे में, तनावपूर्ण जन्म प्रक्रिया बच्चे की रीढ़ की हड्डी के नुकसान का कारण बन सकती है। श्रम के दौरान रीढ़ की हड्डी के नुकसान का कारण बनने वाले 3 मुख्य कारण है –
संपीड़न
संपीड़न उन मामलों में होता है जहां गर्भाशय और बलों के दबाव में बहुत अंतर होता है जो भ्रूण को जन्म नलिका के साथ आगे बढ़ने की अनुमति नहीं देते हैं।
व्याकुलता
यह तंत्र श्रोणि या सिर के पीछे भ्रूण के कृत्रिम निष्कर्षण से जुड़ा हुआ है।
घूर्णन
इसका संबंध अनियंत्रित जन्म नियंत्रण से है।
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इन तीन प्रमुख कारणों के अलावा, कई बार डिलीवरी के दौरान रीढ़ की हड्डी में जरूरत से ज्यादा खींचाव भी इस क्षति का कारण बन जाता है। दुर्भाग्यवश, ऐसा होने पर रीढ़ की हड्डी को स्थाई नुकसान पहुँचता है और इस नुकसान की भरपाई नहीं हो पाती अर्थात यह रीढ़ की हड्डी को पहुंचने वाली एक स्थाई क्षति है।
रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष के निदान
श्रम के दौरान नवजात शिशु की रीढ़ की हड्डी के घाव की पुष्टि के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जाते हैं –
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- यांत्रिक चोटों का पता लगाकर जैसे कि नाड़ियों से खून निकलना
- अधिक सटीक निदान के लिए अल्ट्रासाउंड का प्रयोग करके
- रेडियोग्राफिक विधियों का उपयोग करके
रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष के दीर्घकालिक प्रभाव
कुछ मामलों में, बच्चे की रीढ़ की हड्डी संबंधी जन्मजात दोष कभी ठीक नहीं हो पाता और यह क्षति पक्षाघात अर्थात लक़वे का कारण भी बन जाती है। इसके अलावा, कई मामलों में रीढ़ की हड्डी के इस नुकसान की वजह से बच्चे में बौद्धिक विकलांगता भी देखी गई है। ज्यादा गंभीर मामलों में इस क्षति के कारण बच्चों की मृत्यु भी हुई है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, रीढ़ की हड्डी के जन्मजात दोष के दीर्घकालिक प्रभाव इस बात पर भी निर्भर करते हैं कि क्या इस चोट के कारण हड्डी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है या नहीं। अगर हड्डी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त हो चुकी है, तो समस्या का कोई इलाज नहीं है। लेकिन, अगर हड्डी पूरी तरह से क्षतिग्रस्त नहीं हुई है, तो मस्तिष्क को संवाद करने और रीढ़ की हड्डी तक संदेश भेजने का एक तरीका अभी भी है।
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विशेषज्ञों के मुताबिक, सौभाग्यवश, अधिकतर मामलों में, जन्म से पहले या जन्म की प्रक्रिया के दौरान शिशु को लगने वाली रीढ़ की हड्डी की चोटें ज्यादा गंभीर नहीं होती। इसलिए, किसी विशेषज्ञ की राय लिए बिना नाउम्मीद नहीं होना चाहिए।
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